अपने भाई की मौत की ख़बर सुनकर प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो तुरंत कराची
पहुंचीं और नंगे पैर अपने मृत भाई को देखने मिड ईस्ट अस्पताल गईं.
बाद में लरकाना में उन्होंने एक भाव विव्हल भाषण देते हुए कहा, "1977 में जब मार्शल लॉ लगा और सेना सत्ता में आ गई, मीर मुर्तज़ा भुट्टो एक नौजवान शख़्स था. उसे मुल्क छोड़ना पड़ा. सेना की वजह से वो वतन लौट नहीं सके. वो अपने वालिद के आख़िरी दीदार से महरूम रहा."
"वो अपने छोटे भाई शाहनवाज़ को दफ़नाने के लिए भी नहीं आ सका और वो आज वो खुद हमारे बीच मौजूद नहीं है. मीर मुर्तज़ा भुट्टो इस दुनिया से रुख़्सत हो गया लेकिन वो हमारे दिलों में ज़िदा है और हमेशा ज़िदा रहेगा, क्योंकि शहीद कभी नहीं मरते हैं."
मुर्तज़ा भुट्टो के समर्थकों ने आरोप लगाया कि मुर्तज़ा को कराची की पुलिस ने योजना बना कर मारा था.
पुलिस ने पहले सड़क की बत्तियाँ बुझा दीं और फिर मुर्तज़ा के काफ़िले पर गोलियाँ चलाईं. पुलिस ने इसका खंडन किया.
विपक्ष की चिंताओं और सरकार की दलीलों के बीच यूएपीए ऐक्ट में छठा संशोधन तो पारित हो गया लेकिन इसके साथ ही आतंकवाद ख़त्म करने के नाम पर बनाए गए इस क़ानून को लेकर एक बार फिर से विवाद शुरू हो गया है.
यहां तक कि ये विवाद बहस से आगे निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत में दो जनहित याचिकाओं की शक्ल में पहुंच गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर केंद्र से अपना पक्ष रखने के लिए कहा है.
अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर सुनवाई हो सकती है.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शुएब सडल ने कहा, "पुलिस भुट्टो के साथ आ रहे बंदूकधारियों को रोकने की कोशिश कर रही थी. जैसे ही उन्हें रुकने
मुर्तज़ा की मौत कई सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है.
5 दिसंबर, 2013 को इस हत्याकांड से जुड़े कई व्यक्तियों को बरी कर दिया गया, लेकिन मुर्तज़ा की बेटी फ़ातिमा इसके पीछे सत्ता से जुड़े कुछ लोगों को दोषी मानती हैं.
उनका कहना है, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को 1979 में मारा गया लेकिन उन्हें कभी न्याय नहीं मिला. शाहनवाज़ 1985 में मारे गए लेकिन कभी भी किसी को उनकी मौत का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया."
"मेरे पिता मुर्तज़ा 1996 में मारे गए और 2009 में पाकिस्तान की एक अदालत ने ये कहा कि उन्हें किसी ने नहीं मारा. 2007 में बेनज़ीर रावलपिंडी में एक रैली में मारी गईं और इस पर कोई पुलिस रिपोर्ट भी नहीं की गई."
का इशारा किया गया, उन्होंने पुलिस पर गोली चला दी और पुलिस को आत्मरक्षा में गोली का जवाब देना पड़ा."
सरकार को अगर इस बात का 'यक़ीन' हो जाए कि कोई व्यक्ति या संगठन 'आतंकवाद' में शामिल है तो वो उसे 'आतंकवादी' क़रार दे सकती है.
यहां आतंकवाद का मतलब आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देना या उसमें शामिल होना, आतंकवाद के लिए तैयारी करना या उसे बढ़ावा देना या किसी और तरीक़े से इससे जुड़ना है.
दिलचस्प बात ये है कि 'यक़ीन की बुनियाद पर' किसी को आतंकवादी क़रार देने का ये हक़ सरकार के पास है न कि सबूतों और गवाहों के आधार पर फ़ैसला देने वाली किसी अदालत के पास.
कई जानकार मानते हैं कि राजनैतिक-वैचारिक विरोधियों को इसका निशाना बनाया जा सकता है.
यूएपीए ऐक्ट में छठे संशोधन के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले एडवोकेट सजल अवस्थी कहते हैं, "यूएपीए ऐक्ट के सेक्शन 35 और 36 के तहत सरकार बिना किसी दिशानिर्देश के, बिना किसी तयशुदा प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति को आतंकवादी क़रार दे सकती है. किसी व्यक्ति को कब आतंकवादी क़रार दिया जा सकता है? ऐसा जांच के दौरान किया जा सकता है? या इसके बाद? या सुनवाई के दौरान? या गिरफ़्तारी से पहले? ये क़ानून इन सवालों पर कुछ नहीं कहता है."
एडवोकेट सजल अवस्थी बताते हैं, "हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के तहत कोई अभियुक्त तब तक बेक़सूर है जब तक कि उसके ख़िलाफ़ दोष साबित न हो जाए. लेकिन इस मामले में जब आप किसी व्यक्ति को सुनवाई के नतीजे आने से पहले ही आतंकवादी क़रार दे देते हैं तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ये संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों के भी ख़िलाफ़ है."
बाद में लरकाना में उन्होंने एक भाव विव्हल भाषण देते हुए कहा, "1977 में जब मार्शल लॉ लगा और सेना सत्ता में आ गई, मीर मुर्तज़ा भुट्टो एक नौजवान शख़्स था. उसे मुल्क छोड़ना पड़ा. सेना की वजह से वो वतन लौट नहीं सके. वो अपने वालिद के आख़िरी दीदार से महरूम रहा."
"वो अपने छोटे भाई शाहनवाज़ को दफ़नाने के लिए भी नहीं आ सका और वो आज वो खुद हमारे बीच मौजूद नहीं है. मीर मुर्तज़ा भुट्टो इस दुनिया से रुख़्सत हो गया लेकिन वो हमारे दिलों में ज़िदा है और हमेशा ज़िदा रहेगा, क्योंकि शहीद कभी नहीं मरते हैं."
मुर्तज़ा भुट्टो के समर्थकों ने आरोप लगाया कि मुर्तज़ा को कराची की पुलिस ने योजना बना कर मारा था.
पुलिस ने पहले सड़क की बत्तियाँ बुझा दीं और फिर मुर्तज़ा के काफ़िले पर गोलियाँ चलाईं. पुलिस ने इसका खंडन किया.
"आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने के नाम पर
सरकार जनता पर राज्य का आंतकवाद थोप रही है. विरोध जताने वालों को अब मनमाने तरीक़े से आंतकवादी क़रार दिया जा सकता है."
दो अगस्त को अनलॉफ़ुल ऐक्टिविटिज (प्रिवेंशन) संशोधन बिल पर राज्यसभा
में बहस के दौरान सीपीएम के सांसद इलामरम करीम की चिंताओं के जवाब में
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था, "अगर हम एक संगठन पर प्रतिबंध लगाते हैं तो
लोग दूसरा संगठन बना लेते हैं. आतंकवादी गतिविधियां संगठन अंजाम नहीं देते. इसे कोई व्यक्ति अंजाम देता है."विपक्ष की चिंताओं और सरकार की दलीलों के बीच यूएपीए ऐक्ट में छठा संशोधन तो पारित हो गया लेकिन इसके साथ ही आतंकवाद ख़त्म करने के नाम पर बनाए गए इस क़ानून को लेकर एक बार फिर से विवाद शुरू हो गया है.
यहां तक कि ये विवाद बहस से आगे निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत में दो जनहित याचिकाओं की शक्ल में पहुंच गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर केंद्र से अपना पक्ष रखने के लिए कहा है.
अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर सुनवाई हो सकती है.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शुएब सडल ने कहा, "पुलिस भुट्टो के साथ आ रहे बंदूकधारियों को रोकने की कोशिश कर रही थी. जैसे ही उन्हें रुकने
मुर्तज़ा की मौत कई सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब आज तक नहीं दिया जा सका है.
5 दिसंबर, 2013 को इस हत्याकांड से जुड़े कई व्यक्तियों को बरी कर दिया गया, लेकिन मुर्तज़ा की बेटी फ़ातिमा इसके पीछे सत्ता से जुड़े कुछ लोगों को दोषी मानती हैं.
उनका कहना है, "ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को 1979 में मारा गया लेकिन उन्हें कभी न्याय नहीं मिला. शाहनवाज़ 1985 में मारे गए लेकिन कभी भी किसी को उनकी मौत का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया."
"मेरे पिता मुर्तज़ा 1996 में मारे गए और 2009 में पाकिस्तान की एक अदालत ने ये कहा कि उन्हें किसी ने नहीं मारा. 2007 में बेनज़ीर रावलपिंडी में एक रैली में मारी गईं और इस पर कोई पुलिस रिपोर्ट भी नहीं की गई."
का इशारा किया गया, उन्होंने पुलिस पर गोली चला दी और पुलिस को आत्मरक्षा में गोली का जवाब देना पड़ा."
सरकार को अगर इस बात का 'यक़ीन' हो जाए कि कोई व्यक्ति या संगठन 'आतंकवाद' में शामिल है तो वो उसे 'आतंकवादी' क़रार दे सकती है.
यहां आतंकवाद का मतलब आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देना या उसमें शामिल होना, आतंकवाद के लिए तैयारी करना या उसे बढ़ावा देना या किसी और तरीक़े से इससे जुड़ना है.
दिलचस्प बात ये है कि 'यक़ीन की बुनियाद पर' किसी को आतंकवादी क़रार देने का ये हक़ सरकार के पास है न कि सबूतों और गवाहों के आधार पर फ़ैसला देने वाली किसी अदालत के पास.
कई जानकार मानते हैं कि राजनैतिक-वैचारिक विरोधियों को इसका निशाना बनाया जा सकता है.
यूएपीए ऐक्ट में छठे संशोधन के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले एडवोकेट सजल अवस्थी कहते हैं, "यूएपीए ऐक्ट के सेक्शन 35 और 36 के तहत सरकार बिना किसी दिशानिर्देश के, बिना किसी तयशुदा प्रक्रिया का पालन किए किसी व्यक्ति को आतंकवादी क़रार दे सकती है. किसी व्यक्ति को कब आतंकवादी क़रार दिया जा सकता है? ऐसा जांच के दौरान किया जा सकता है? या इसके बाद? या सुनवाई के दौरान? या गिरफ़्तारी से पहले? ये क़ानून इन सवालों पर कुछ नहीं कहता है."
एडवोकेट सजल अवस्थी बताते हैं, "हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के तहत कोई अभियुक्त तब तक बेक़सूर है जब तक कि उसके ख़िलाफ़ दोष साबित न हो जाए. लेकिन इस मामले में जब आप किसी व्यक्ति को सुनवाई के नतीजे आने से पहले ही आतंकवादी क़रार दे देते हैं तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ये संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों के भी ख़िलाफ़ है."