ऐसा ही एक वाकया लाहौर से 30 मील दक्षिण
में हिंदू देवताओं के नाम पर बसे एक छोटे से शहर कोट राधा किशन में देखने
को मिला था. कोट राधा किशन के चारों तरफ हरे भरे खेत नज़र आते हैं. लेकिन हर आधे मील की दूरी पर यहां आग उगलती चिमनियां नजर आती हैं, जिनकी भट्ठियों
में ईंटें पक रही होती हैं.
ईशनिंदा के आरोप में ईसाई जोड़े शहज़ाद और शमा मसीह को साल 2014 में भीड़ ने ज़िंदा जला दिया था.
स्थानीय पत्रकार राणा खालिद उस घटना को याद करते हुए एक चिमनी के पास ईंट के बने एक छोटे से कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "उन दोनों को इसी कमरे में बंद रखा गया था ताकि उन्हें भीड़ से बचाया जा सके."
ईशनिंदा के आरोप में ईसाई जोड़े शहज़ाद और शमा मसीह को साल 2014 में भीड़ ने ज़िंदा जला दिया था.
स्थानीय पत्रकार राणा खालिद उस घटना को याद करते हुए एक चिमनी के पास ईंट के बने एक छोटे से कमरे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, "उन दोनों को इसी कमरे में बंद रखा गया था ताकि उन्हें भीड़ से बचाया जा सके."
लेकिन जैसा कि खालिद बताते हैं कि
स्थानीय मौलवी के नेतृत्व में जमा भीड़ इतनी गुस्साई थी कि कुछ लोग इस कमरे
की छत पर चढ़ गए और उन्होंने छत तोड़कर दोनों को बाहर निकाल लिया.
खालिद कहते हैं, "उन दोनों को पहले तो लाठी और ईंटों से बुरी तरह मारा पीटा गया और उसके बाद गांव के आक्रोशित लोगों ने उन दोनों को भट्ठी में झोंक दिया."
शमा तब चार महीने की गर्भवती थीं. भीड़ इस बात पर यक़ीन कर रही थी कि शहज़ाद और शमा ने कुरान के कई पन्नों को जलाया है. शहज़ाद का परिवार आज भी इससे इनकार करता है. उनका कहना है कि दोनों ने अपने पिता के कुछ पुराने दस्तावेज़ों को जलाया था.
शमा और शहज़ाद की हत्या के आरोप में स्थानीय मौलवी सहित पांच लोगों को मौत की सज़ा हुई और गांव के ही आठ अन्य लोगों को हिंसा करने के आरोप में दो-दो साल की जेल की सज़ा हुई.
खालिद कहते हैं, "उन दोनों को पहले तो लाठी और ईंटों से बुरी तरह मारा पीटा गया और उसके बाद गांव के आक्रोशित लोगों ने उन दोनों को भट्ठी में झोंक दिया."
शमा तब चार महीने की गर्भवती थीं. भीड़ इस बात पर यक़ीन कर रही थी कि शहज़ाद और शमा ने कुरान के कई पन्नों को जलाया है. शहज़ाद का परिवार आज भी इससे इनकार करता है. उनका कहना है कि दोनों ने अपने पिता के कुछ पुराने दस्तावेज़ों को जलाया था.
शमा और शहज़ाद की हत्या के आरोप में स्थानीय मौलवी सहित पांच लोगों को मौत की सज़ा हुई और गांव के ही आठ अन्य लोगों को हिंसा करने के आरोप में दो-दो साल की जेल की सज़ा हुई.
पाकिस्तान के इस विवादास्पद क़ानून की आग
केवल ईसाइयों को नहीं जला रही है. इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के अहमदिया
मुसलमानों को सताने के लिए भी किया जा रहा है.
अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तान में गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक माना जाता है. क़ानून के मुताबिक़ अहमदिया अपनी इबादत की जगह को ना तो मस्जिद कह सकते हैं और ना ही कुरान की आयातें पढ़ सकते हैं.
इतना ही नहीं सार्वजनिक जगहों पर उन्हें अपनी धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करने की इजाजत भी नहीं है.
असलम जमील (असली नाम नहीं) एक अहमदिया किसान हुआ करते थे. वे साल 2009 में दक्षिण पंजाब में अपने गेहूं के खेत में काम कर रहे थे, तब कुछ स्थानीय लोगों ने आकर कहा कि यहां से भागो.
असलम पर स्थानीय इमाम ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगाया था, इसके बाद उनके जान के पीछे स्थानीय लोगों की भीड़ पड़ गई थी.
भरे हुए गले से असलम बताते हैं, "मौलवी ने आरोप लगाया था कि मैंने पैगंबर का नाम शौचालय में लिखने के लिए चार अहमदिया बच्चों को उकसाया, हालांकि खुदा जानता है कि ये झूठ है."
अहमदिया मुसलमानों को पाकिस्तान में गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक माना जाता है. क़ानून के मुताबिक़ अहमदिया अपनी इबादत की जगह को ना तो मस्जिद कह सकते हैं और ना ही कुरान की आयातें पढ़ सकते हैं.
इतना ही नहीं सार्वजनिक जगहों पर उन्हें अपनी धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करने की इजाजत भी नहीं है.
असलम जमील (असली नाम नहीं) एक अहमदिया किसान हुआ करते थे. वे साल 2009 में दक्षिण पंजाब में अपने गेहूं के खेत में काम कर रहे थे, तब कुछ स्थानीय लोगों ने आकर कहा कि यहां से भागो.
असलम पर स्थानीय इमाम ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगाया था, इसके बाद उनके जान के पीछे स्थानीय लोगों की भीड़ पड़ गई थी.
भरे हुए गले से असलम बताते हैं, "मौलवी ने आरोप लगाया था कि मैंने पैगंबर का नाम शौचालय में लिखने के लिए चार अहमदिया बच्चों को उकसाया, हालांकि खुदा जानता है कि ये झूठ है."
असलम ने अंधेरा होने का इंतज़ार किया और
अपने घर के पिछले दरवाज़े से निकल भागे लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद उन्हें
एहसास हुआ कि भागने से उनकी मुश्किल और बढ़ जाएगी.
ऐसे में वो कहां जाएं, ये सवाल बना हुआ था.
अगली सुबह, उन्होंने खुद को स्थानीय पुलिस स्टेशन के हवाले कर दिया. उनके केस की सुनवाई शुरू होने में दो महीने का वक्त लगा और उन्हें छह महीने जेल में बिताने पड़े.
उनका चेहरा उत्तेजित हो जाता है जब वो बताते हैं, "जज पर काफ़ी दबाव था. अदालत का पूरा कमरा मौलवियों से भरा था, लेकिन जज ने काफ़ी साहस दिखाया."
असलम पर लगे आरोपों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया. लेकिन घर लौटने के बाद असलम ने देखा कि उनके घर को लूट लिया गया है, उनके मवेशियों को भी चुरा लिया गया था.
उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि अब उन्हें देश छोड़ना होगा. उन्होंने कनाडा में शरण मांगी है.
असलम बताते हैं, "मेरे परिवार को धमकी दी गई, उन्हें परेशान किया गया. मेरी रोज़ी रोटी छीन ली गई. मुझे तबाह कर दिया गया. ज़िंदगी बचाने के लिए हम लोगों ने गांव छोड़ दिया."
ऐसे में वो कहां जाएं, ये सवाल बना हुआ था.
अगली सुबह, उन्होंने खुद को स्थानीय पुलिस स्टेशन के हवाले कर दिया. उनके केस की सुनवाई शुरू होने में दो महीने का वक्त लगा और उन्हें छह महीने जेल में बिताने पड़े.
उनका चेहरा उत्तेजित हो जाता है जब वो बताते हैं, "जज पर काफ़ी दबाव था. अदालत का पूरा कमरा मौलवियों से भरा था, लेकिन जज ने काफ़ी साहस दिखाया."
असलम पर लगे आरोपों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया गया. लेकिन घर लौटने के बाद असलम ने देखा कि उनके घर को लूट लिया गया है, उनके मवेशियों को भी चुरा लिया गया था.
उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि अब उन्हें देश छोड़ना होगा. उन्होंने कनाडा में शरण मांगी है.
असलम बताते हैं, "मेरे परिवार को धमकी दी गई, उन्हें परेशान किया गया. मेरी रोज़ी रोटी छीन ली गई. मुझे तबाह कर दिया गया. ज़िंदगी बचाने के लिए हम लोगों ने गांव छोड़ दिया."
जिन लोगों पर ईशनिंदा के मामले चलते हैं
और जिन्हें ईशनिंदा का दोषी पाया जाता है, उनके साथ ये कलंक अदालत और जेल
के बाहर भी चिपक जाता है.
शकील वाजिद (असली नाम नहीं) भी अहमदिया हैं. वे बताते हैं कि किस तरह से सुनवाई के दौरान भीड़ जमा होती है.
वे कहते हैं, "सुनवाई के दौरान जमा होने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों से निचली अदालतों के जजों पर ऊपरी अदालत के जजों की तुलना में कहीं ज़्यादा दबाव होता है. निचली अदालतों के जज के पास नाममात्र की सुरक्षा व्यवस्था होती है, उन्हें अपनी जान को भी देखना पड़ता है."
ईशनिंदा के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद शकील ने पंजाब के तीन बेहद सुरक्षित जेलों में दो साल बिताए हैं.
शकील वाजिद (असली नाम नहीं) भी अहमदिया हैं. वे बताते हैं कि किस तरह से सुनवाई के दौरान भीड़ जमा होती है.
वे कहते हैं, "सुनवाई के दौरान जमा होने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों से निचली अदालतों के जजों पर ऊपरी अदालत के जजों की तुलना में कहीं ज़्यादा दबाव होता है. निचली अदालतों के जज के पास नाममात्र की सुरक्षा व्यवस्था होती है, उन्हें अपनी जान को भी देखना पड़ता है."
ईशनिंदा के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद शकील ने पंजाब के तीन बेहद सुरक्षित जेलों में दो साल बिताए हैं.
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