एनेस्थीसिया में भी जिस प्रकार की दवाओं का इस्तेमाल होता हो मरीज़ की उम्र, ऊंचाई, और वज़न के मुताबिक़ दिया जाता है. साथ ही ये भी देखा जाता है
कि मरीज़ किसी अन्य प्रकार की दवा तो नहीं ले रहा है या वो सिगरेट पीने का आदी तो नहीं है.
कुछ जगहों पर न्यूरोमस्कुलर ब्लॉकर का इस्तेमाल होता है. ये एक ख़ास प्रकार का एनेस्थीसिया है, जो शरीर को वक़्ती तौर पर सुन्न कर देता है. ताकि शरीर सर्जरी के दौरान ना तो कुछ महसूस कर पाए और ना ही मरीज़ शरीर को हिला डुला सके.
एनेस्थीसिया लेने के बाद कुछ देर के लिए मरीज़ कोमा जैसी हालत में तो पहुंचता है. लेकिन, सुरक्षित तौर पर उससे बाहर भी आ जाता है और उसकी तकलीफ़ भी बिना किसी दर्द के ख़त्म हो जाती है.
लेकिन एनेस्थीसिया का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर ही किया जाता है. मिसाल के लिए अगर मरीज़ के शरीर से बड़ी मात्रा में ख़ून बहकर निकल गया है तो उसे कम असर वाला एनेस्थीसिया दिया जाता है.
एनेस्थीसिया देने के लिए शरीर में ख़ून उचित मात्रा में होने चाहिए. यहां तक कि न्यूरोमॉस्कुलर ब्लॉकर भी मरीज़ को बहुत सोच सझकर दिया जाता है क्योंकि इसके बाद शरीर कुछ वक़्त के लिए पैरालाइज़ हो जाता है. लेकिन उसे पता रहता है कि हो क्या रहा है और दिमाग़ किसी भी बात को एक दूसरे से जोड़ नहीं पाता.
एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ कितना होश में है, उसे तकलीफ़ का एहसास हो रहा है या नहीं, ये जानने के लिए आइसोलेट फ़ोरआर्म तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.
यानी एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ के बाज़ू पर एक कफ़ बांध दिया जाता है और कुछ देर बाद उससे मुट्ठी खोलने और बंद करने को कहा जाता है.
अगर मरीज़ आदेशानुसार करने लगता है तो पता चल जाता है कि अभी दवा का असर पूरी तरह नहीं हुआ है.
रिसर्च बताती हैं कि एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ के होश में रहने के केस फ़िलहाल बहुत कम हैं. लेकिन इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है आख़िर ऐसा क्यों है.
मरीज़ को भी इस बात की ताकीद की जानी चाहिए कि अगर वो एनेस्थीसिया देने के बाद भी होश में हैं, तो तुरंत मेडिकल स्टाफ़ को बताएं ताकि सर्जरी के दौरान होश में रहने की वजह से होने वाली तकलीफ़ से बचा जा सके.
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने कहा है, "आपने इस बात की पुष्टि की है कि नमो टीवी/कंटेंट टीवी पर चलने वाली सामग्री बिना आपकी एमसीएमसी कमिटी की मंज़ूरी के प्रसारित हो रही है."
इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा है कि नमो टीवी एक राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित है और इस पर दिखाई जा रही राजनीतिक सामग्री के सभी रिकॉर्डेड कार्यक्रम और राजनीतिक विज्ञापनों की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है.
साथ ही आयोग ने कहा है कि दिखाई जा रही ऐसी राजनीतिक प्रचार की सामग्री जिसकी अनुमति नहीं ली गई है, उस पर तुरंत रोक लगा दी जाए और किसी भी तरह की राजनीतिक सामग्री को उसके निर्देशों के अनुसार ही अनुमति दी जाए.
बीजेपी नेताओं का कहना था कि नमो टीवी नमो ऐप का हिस्सा है लेकिन बाद में 28 मार्च के बाद यह डीटीएच प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाया जाने लगा.
हालांकि, बाद में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग से नमो टीवी की शिकायत की. दोनों पार्टियों का कहना था कि यह चैनल आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है क्योंकि आम चुनाव की घोषणा के बाद यह चैनल अस्तित्व में आया.
वहीं, डीटीएच पर सर्विस देने वाले टाटा स्काई ने इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि नमो टीवी 'हिंदी न्यूज़ चैनल' नहीं है.
यह एक विशेष सुविधा है जो इंटरनेट के माध्यम से मुहैया कराई जा रही है और इसके प्रसारण के लिए सरकारी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है.
कुछ जगहों पर न्यूरोमस्कुलर ब्लॉकर का इस्तेमाल होता है. ये एक ख़ास प्रकार का एनेस्थीसिया है, जो शरीर को वक़्ती तौर पर सुन्न कर देता है. ताकि शरीर सर्जरी के दौरान ना तो कुछ महसूस कर पाए और ना ही मरीज़ शरीर को हिला डुला सके.
एनेस्थीसिया लेने के बाद कुछ देर के लिए मरीज़ कोमा जैसी हालत में तो पहुंचता है. लेकिन, सुरक्षित तौर पर उससे बाहर भी आ जाता है और उसकी तकलीफ़ भी बिना किसी दर्द के ख़त्म हो जाती है.
लेकिन एनेस्थीसिया का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर ही किया जाता है. मिसाल के लिए अगर मरीज़ के शरीर से बड़ी मात्रा में ख़ून बहकर निकल गया है तो उसे कम असर वाला एनेस्थीसिया दिया जाता है.
एनेस्थीसिया देने के लिए शरीर में ख़ून उचित मात्रा में होने चाहिए. यहां तक कि न्यूरोमॉस्कुलर ब्लॉकर भी मरीज़ को बहुत सोच सझकर दिया जाता है क्योंकि इसके बाद शरीर कुछ वक़्त के लिए पैरालाइज़ हो जाता है. लेकिन उसे पता रहता है कि हो क्या रहा है और दिमाग़ किसी भी बात को एक दूसरे से जोड़ नहीं पाता.
एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ कितना होश में है, उसे तकलीफ़ का एहसास हो रहा है या नहीं, ये जानने के लिए आइसोलेट फ़ोरआर्म तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.
यानी एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ के बाज़ू पर एक कफ़ बांध दिया जाता है और कुछ देर बाद उससे मुट्ठी खोलने और बंद करने को कहा जाता है.
अगर मरीज़ आदेशानुसार करने लगता है तो पता चल जाता है कि अभी दवा का असर पूरी तरह नहीं हुआ है.
रिसर्च बताती हैं कि एनेस्थीसिया देने के बाद मरीज़ के होश में रहने के केस फ़िलहाल बहुत कम हैं. लेकिन इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है आख़िर ऐसा क्यों है.
मरीज़ को भी इस बात की ताकीद की जानी चाहिए कि अगर वो एनेस्थीसिया देने के बाद भी होश में हैं, तो तुरंत मेडिकल स्टाफ़ को बताएं ताकि सर्जरी के दौरान होश में रहने की वजह से होने वाली तकलीफ़ से बचा जा सके.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों
और बीजेपी समर्थित सामग्री को प्रसारित करने वाले नमो टीवी चैनल को लेकर चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को आदेश जारी किए हैं.
चुनाव
आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को आदेश दिया है कि बिना प्रमाणित किसी भी
चुनावी सामग्री को प्रसारित न किया जाए. चुनाव आयोग का कहना है कि मीडिया
सर्टिफ़िकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी (एमसीएमसी) से प्रमाणित सामग्री को ही नमो टीवी पर प्रसारित किया जाए.दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने कहा है, "आपने इस बात की पुष्टि की है कि नमो टीवी/कंटेंट टीवी पर चलने वाली सामग्री बिना आपकी एमसीएमसी कमिटी की मंज़ूरी के प्रसारित हो रही है."
इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा है कि नमो टीवी एक राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित है और इस पर दिखाई जा रही राजनीतिक सामग्री के सभी रिकॉर्डेड कार्यक्रम और राजनीतिक विज्ञापनों की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है.
साथ ही आयोग ने कहा है कि दिखाई जा रही ऐसी राजनीतिक प्रचार की सामग्री जिसकी अनुमति नहीं ली गई है, उस पर तुरंत रोक लगा दी जाए और किसी भी तरह की राजनीतिक सामग्री को उसके निर्देशों के अनुसार ही अनुमति दी जाए.
बीजेपी नेताओं का कहना था कि नमो टीवी नमो ऐप का हिस्सा है लेकिन बाद में 28 मार्च के बाद यह डीटीएच प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाया जाने लगा.
हालांकि, बाद में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग से नमो टीवी की शिकायत की. दोनों पार्टियों का कहना था कि यह चैनल आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है क्योंकि आम चुनाव की घोषणा के बाद यह चैनल अस्तित्व में आया.
वहीं, डीटीएच पर सर्विस देने वाले टाटा स्काई ने इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि नमो टीवी 'हिंदी न्यूज़ चैनल' नहीं है.
यह एक विशेष सुविधा है जो इंटरनेट के माध्यम से मुहैया कराई जा रही है और इसके प्रसारण के लिए सरकारी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है.
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