भारत में कुपोषण को लेकर ज़िला स्तर पर आंकड़े जुटाए जाते हैं.
इन आंकड़ों के आधार पर कुपोषण निवारण मुहिम की सफ़लता - विफ़लता भी ज़िला प्रशासन के स्तर पर ही आंकी जाती है.
इसी वजह से आज तक किसी सांसद को उसकी संसदीय सीट में कुपोषण को लेकर जवाबदेह नहीं ठहराया जा सका है.
लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि किसी भी व्यापक राष्ट्रीय संकट से निबटने के लिए सार्थक नीतियों को बनाने की जिम्मेदारी सांसदों की होती है और सांसद समय समय पर अलग-अलग मुद्दों पर संसद में चर्चा करके नीतियों का निर्माण भी करते हैं
लेकिन हैरानी है कि कुपोषण दूर करने के लिए बनाई गई नीतियों की विफ़लता के लिए सांसदों की जवाबदेही तय करने के लिए कोई मापदंड नहीं है.
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अक्षय स्वामीनाथन और एस वी सुब्रमण्यन समेत कई विशेषज्ञों ने एक नए अध्ययन को सामने रखा है जिसकी मदद से कुपोषण को लेकर संसदीय सीटों के प्रदर्शन का आकलन किया जा सकता है.
इकॉनोमिक एंड पब्लिक वीकली में छपे इस अध्ययन के मुताबिक राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी में कुपोषण का स्तर राष्ट्रीय प्रसार से कहीं ज़्यादा है.
इसके तहत स्टंटिंग, वेस्टिंग, अंडरवेट, और एनिमिया के आधार पर देश की 543 लोकसभा सीटों के प्रदर्शन को मांपा गया है.
इस अध्ययन में साल 2015-16 में जारी किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में जारी आंकड़ों को इस्तेमाल किया गया है.
वाराणसी में स्टंटिंग 43 फीसदी, अंडरवेट 46 फीसदी, वेस्टिंग 24 फीसदी और एनीमिया 60 फीसदी है. जबकि भारत में स्टंटिंग 38 फीसदी, अंडरवेट 36 फीसदी, वेस्टिंग 23 फीसदी और एनिमिया 59 फीसदी है.
बीबीसी हिंदी ने यही जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी का दौरा किया.
आंकड़ों के लिहाज़ से कुपोषण दूर करने में इन दोनों सीटों का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से भी खराब है.
राहुल गांधी ने पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान मध्य प्रदेश में कुपोषण के लिए मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि एक ओर मध्य प्रदेश में बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं वहीं मोदी जी मार्केटिंग में व्यस्त हैं.
अगर नरेंद्र मोदी की बात करें तो मोदी ने भी समय-समय पर कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कुपोषण के मुद्दे पर खरी-खोटी सुनाई है.
राहुल गांधी ने बीते पांच सालों में एक सांसद के रूप में संसद में कुपोषण की समस्या को लेकर एक भी सवाल नहीं उठाया है.
लेकिन इन दोनों बड़े नेताओं की लोकसभा सीटों में कुपोषण की मार झेल रहे बच्चों की स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है.
कमर पर बंधा काला धागा, गले में लॉकेट और हाथों में काला धागा.
यहाँ के गांवों में नंग-धड़ंग घूम रहे बच्चों के तन-बदन पर ये चीज़ें सबसे पहले दिखाई देती हैं.
क्योंकि इन बच्चों की माओं के बीच कुपोषण को लेकर एक समझ का अभाव है.
ये महिलाएं आज भी अपने बच्चों के कमजोर या बीमार होने के लिए दैवीय आपदाओं को ज़िम्मेदार मानती हैं.
वाराणसी ज़िले में अतिकुपोषित बच्चों की संख्या चार हज़ार से भी ज़्यादा है. वहीं, अमेठी में हर छठा बच्चा कुपोषित है. ये आंकड़े सरकार के ही हैं और देश की उन चर्चित और हाई प्रोफ़ाइल सीटों के हैं, जिनकी नुमाइंदगी करने वाले एक व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) ने पिछले पाँच साल तक नीतियां तय की हैं, और दूसरी सीट का प्रतिनिधित्व 15 साल से राहुल गांधी के हाथों में हैं.
ऐसे में सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कुपोषण जैसी समस्या को लेकर सरकारें और उनके प्रतिनिधि किस कदर गंभीर हैं.
इन आंकड़ों के आधार पर कुपोषण निवारण मुहिम की सफ़लता - विफ़लता भी ज़िला प्रशासन के स्तर पर ही आंकी जाती है.
इसी वजह से आज तक किसी सांसद को उसकी संसदीय सीट में कुपोषण को लेकर जवाबदेह नहीं ठहराया जा सका है.
लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि किसी भी व्यापक राष्ट्रीय संकट से निबटने के लिए सार्थक नीतियों को बनाने की जिम्मेदारी सांसदों की होती है और सांसद समय समय पर अलग-अलग मुद्दों पर संसद में चर्चा करके नीतियों का निर्माण भी करते हैं
लेकिन हैरानी है कि कुपोषण दूर करने के लिए बनाई गई नीतियों की विफ़लता के लिए सांसदों की जवाबदेही तय करने के लिए कोई मापदंड नहीं है.
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अक्षय स्वामीनाथन और एस वी सुब्रमण्यन समेत कई विशेषज्ञों ने एक नए अध्ययन को सामने रखा है जिसकी मदद से कुपोषण को लेकर संसदीय सीटों के प्रदर्शन का आकलन किया जा सकता है.
इकॉनोमिक एंड पब्लिक वीकली में छपे इस अध्ययन के मुताबिक राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी में कुपोषण का स्तर राष्ट्रीय प्रसार से कहीं ज़्यादा है.
इसके तहत स्टंटिंग, वेस्टिंग, अंडरवेट, और एनिमिया के आधार पर देश की 543 लोकसभा सीटों के प्रदर्शन को मांपा गया है.
इस अध्ययन में साल 2015-16 में जारी किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में जारी आंकड़ों को इस्तेमाल किया गया है.
वाराणसी में स्टंटिंग 43 फीसदी, अंडरवेट 46 फीसदी, वेस्टिंग 24 फीसदी और एनीमिया 60 फीसदी है. जबकि भारत में स्टंटिंग 38 फीसदी, अंडरवेट 36 फीसदी, वेस्टिंग 23 फीसदी और एनिमिया 59 फीसदी है.
बीबीसी हिंदी ने यही जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी का दौरा किया.
आंकड़ों के लिहाज़ से कुपोषण दूर करने में इन दोनों सीटों का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से भी खराब है.
राहुल गांधी ने पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान मध्य प्रदेश में कुपोषण के लिए मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि एक ओर मध्य प्रदेश में बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं वहीं मोदी जी मार्केटिंग में व्यस्त हैं.
अगर नरेंद्र मोदी की बात करें तो मोदी ने भी समय-समय पर कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कुपोषण के मुद्दे पर खरी-खोटी सुनाई है.
राहुल गांधी ने बीते पांच सालों में एक सांसद के रूप में संसद में कुपोषण की समस्या को लेकर एक भी सवाल नहीं उठाया है.
लेकिन इन दोनों बड़े नेताओं की लोकसभा सीटों में कुपोषण की मार झेल रहे बच्चों की स्थिति कुछ और ही कहानी बयां करती है.
कमर पर बंधा काला धागा, गले में लॉकेट और हाथों में काला धागा.
यहाँ के गांवों में नंग-धड़ंग घूम रहे बच्चों के तन-बदन पर ये चीज़ें सबसे पहले दिखाई देती हैं.
क्योंकि इन बच्चों की माओं के बीच कुपोषण को लेकर एक समझ का अभाव है.
ये महिलाएं आज भी अपने बच्चों के कमजोर या बीमार होने के लिए दैवीय आपदाओं को ज़िम्मेदार मानती हैं.
वाराणसी ज़िले में अतिकुपोषित बच्चों की संख्या चार हज़ार से भी ज़्यादा है. वहीं, अमेठी में हर छठा बच्चा कुपोषित है. ये आंकड़े सरकार के ही हैं और देश की उन चर्चित और हाई प्रोफ़ाइल सीटों के हैं, जिनकी नुमाइंदगी करने वाले एक व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) ने पिछले पाँच साल तक नीतियां तय की हैं, और दूसरी सीट का प्रतिनिधित्व 15 साल से राहुल गांधी के हाथों में हैं.
ऐसे में सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कुपोषण जैसी समस्या को लेकर सरकारें और उनके प्रतिनिधि किस कदर गंभीर हैं.
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